Thursday, April 28, 2011

The Missing Voice



The Missing voice

कमरे में सन्नाटा सा है

छत पर पंखा कड़-कड़-कड़-कड़
अपनी धुन में चलता जाता
शीतल मंद हवा के झोंके 
दबे पाँव खिड़की से आते
फिर भी पर्दे हिल जाते हैं

मोटर कारें चलतीं नीचे 
शोर मगर ऊपर तक आता
फ्रिज की घूं-घूं चलती है अविराम अकेली,
चाहे दिन का कोई पहर हो

मेरी खिड़की के नीचे बच्चों ने फुटबॉल उछाला 
उनके कोलाहल ने जैसे दीवारों को हिला दिया है

इतना सब कुछ होने पर भी,
कमरे में सन्नाटा सा है...

कैसी है वो ध्वनि जिसे मैं सुनने को आतुर बैठा हूँ 
कौन सा ऐसा सुर है जिसकी कमी मुझे खलती है इतनी

नहीं नहीं, 
छोटी सी वो चिड़िया मेरी खिड़की पर आकर गाती थी, 
दो पल का विश्राम ढूँढती 
अपनी व्यस्त ज़िंदगी से जो, 
मेरी खिड़की की छजली पर
चुव चुव चिव चिव कर जाती थी?

मेरा उसका क्या नाता था
मैं क्यों उसको याद करूँगा?
उसके नन्हे से गीतों का
मुझसे क्या संबंध भला?

फिर भी सच है, 
कई दिनों  से उसका गीत नहीं सुन पाया
शायद उसकी व्यस्त ज़िंदगी बहुत व्यस्त हो गयी कहीं पर
शायद मेरी छजली ही अब  दूर हुई उसकी राहों से
या फिर उसको फ़ुर्सत ही ना रही कि आकर गीत सुनाए

क्यों मुझको विश्वास है फिर भी,
अभी कहीं से वो आएगी, 
फिर अपनी ही भाषा में वो 
चुव चिव का वह गीत गाएगी, 

सोच रहा मैं भी उससे 
अपनी भाषा में पूछूंगा  
“क्या इस छजली से मोह नहीं है,
क्यों इतनी दूर चली जाती हो?”




2 comments:

Always Happy said...

very nice.

I hope the chuv chuv chiv chiv chidiya has returned since you wrote this post.

Sunil Goswami said...

Thank you, AH. This was just a random post inspired by your "chuv chuv chiv chiv" post. :) I don't have any birds singing outside my window but I do have similar pleasurable ingredients in my life. Sorry if I sounds like Sir Humphrey Appleby, I have been watching "Yes, Prime Minister".

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