A ghazal from Momin. It's just a great ghazal, and I love it for the second last sher.
रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह
अटका कहीं जो आप का दिल भी मेरी तरह
ना ताब हिजर में है ना आराम वस्ल में
कम्बख़्त दिल को चैन नहीं है किसी तरह
मर चुक कहीं कि तू गम-ए-हिजरां से छूट जाए
कहते तो हैं भले की वो लेकिन बुरी तरह
ना जाए वाँ बने है ना बिन जाए चैन है
क्या कीजिए हमें तो है मुश्किल सभी तरह
लगती हैं गलियाँ भी तेरे मुँह से क्या भली
क़ुरबान तेरे, फिर मुझे कहले इसी तरह
हूँ जाँ-बा-लब बुतान-ए-सितमगर के हाथ से
क्या सब जहाँ में जीते हैं "मोमिन" इसी तरह?